मन की चाहत


जो बोल ना पाऊ, उसे लिख रहा हु मै...
जीवन के बोझ की घुटन तले, दर्द से मुस्कराना सीख रहा हु मै |

दिल खोल उड़ान भरने की चाहत में...
एक कोना आसमां खोज रहा हु मै |

पूरे जहाँ के लिए खुशियाँ संजोने में मशगूल...
खुद कि खुशी का मखौल बना रहा हु मै |

जो चाहकर भी सुन सके सांझ की सरगम...
उन्हें भोर भये गीत गाना सिखा रहा हु मै |

समय की रेत पर, लकड़ी की शाख से लिखे...
मेरे शब्दों को लहरों में विलीन होते निहार रहा हु मै |

जाऊ कहाँ खुद से जूझने, बातों की तलब लिए...
इसीलिए मूक बना मदारी के बन्दर की सी ज़िन्दगी जी रहा हु मै |

परेशान ना होना यह कविता सुनके, दोस्तों, क्योंकि...
तुम्हारे लिए नहीं, अपितु, इसे खुद के लिए गा रहा हु मै |||

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